दिल की कश्ती को
उतारें मुहब्बत के तूफ़ानों में
शुमार होता है उनका,
ग़ाफ़िलों में, नादानों में।
वो यकीं रखे ज़ेहनीयत
में, ये दिल को दें
अहमियत
बस इतना ही फ़र्क़
होता, फ़र्ज़ानों और दीवानों
में।
कसक के सिवा क्या
पाओगे तहक़ीक़ात करके
उनकी मग़रूरी छुपी
हुई है उनके बहानों में।
वो हमदम भी है,
क़ातिल भी, तमाशबीन भी
तुम्हीं बताओ,
उसे रखूँ अपनों में या बेगानों
में।
चाँद को हँसते देखा,
चकोर को तड़पते देखा
ऐसा वाक़िया आम हो
चला दिल के फ़सानों में।
‘विर्क’ बहारें उनको फिर कभी नसीब
नहीं होती
साथी छोड़कर चले गए
हों जिन्हें वीरानों में।
दिलबागसिंह विर्क
*******




