बुधवार, अक्तूबर 26, 2011

कुंडलिया छंद - 2


                      
        
         दे सबको संदेश यह , दीपों का त्यौहार 
         रौशन सारा विश्व हो , मिट जाए अँधियार ।
         मिट जाए अँधियार , मिटे अज्ञानता सारी 
         अज्ञानता ही आज , शाप है सबसे भारी ।
         रौशनी और ज्ञान , यहाँ तक भी हो, फैले 
         कहे ' विर्क ' कविराय, दीप संदेश यही दे ।

                          * * * * * *

5 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर कुंडलिया छंद ...

दीपावली की शुभकामनायें

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया!
आपको और आपके पूरे परिवार को दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

Dr. shyam gupta ने कहा…

सुंदर....कुंडली छंद हैं ...भाव भी सुंदर हैं ....लय व गति , प्रवाह में कुछ खटकता है ...
---पहली कुंडली में ...
रौशनी हो समीप, उमंग जगे हर घर में
करें तमस का नाश,हो जगमग विश्व भर में । ...तकनीकी दृष्टि से ठीक है ..११-१३..परन्तु प्रवाह में रुकावट है ...देखिये इसे ऐसे ---
हर घर जगे उमंग, रौशनी समीप में हो |
करें तमस का नाश, विश्व भर में जगमग हो ।-- अब प्रवाह अच्छा है...
------वास्तव में कुछ सूक्ष्म विशद नियम भी होते हैं ..यथा दुकल-त्रिकल आदि शब्द-समूह जो पता नहीं चलते बस प्रवाह से ही ठीक होजाते हैं ....
---- दूसरे छंद में---
मिटे अज्ञानता सारी = १४
अज्ञानता ही आज = १२ -- इसीलिये इनमें गति भंग होती है..लय टूटती है ..

संजय भास्कर ने कहा…

सुन्दर कुंडलिया....विर्क जी
आपको और आपके प्रियजनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें….!

संजय भास्कर
आदत....मुस्कुराने की
नई पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

हिन्दी हाइगा ने कहा…

बहुत सुन्दर छंद है...
दीपावली की शुभकामनाएँ!

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