बुधवार, जुलाई 27, 2016

उलझन

आँखों की भाषा
पढाई नहीं जाती कहीं भी 
मुस्कराहटों के अर्थ 
मिलते नहीं किसी शब्दकोश में

तुम्हारी आँखें
तुम्हारी मुस्कराहटें 
सीधा-सादा गद्य कब कहती हैं
कभी वे 
मुझे इजाजत देती लगती हैं
प्यार के इजहार का 
कभी वे
लगती हैं मेरा मुँह चिढ़ाती हुई

क्या समझ सकोगे मेरी उलझन
क्योंकि एक ही अर्थ नहीं होता 
आँखों की कूट भाषा का 
कविता-सी मुस्कान का

दिलबागसिंह विर्क
*****

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (29-07-2016) को "हास्य रिश्तों को मजबूत करता है" (चर्चा अंक-2418) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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