मंगलवार, अगस्त 15, 2017

अब मुहब्बत भी है बदनाम

न डरो, न घबराओ, बस करते रहो अपना काम 
फिर मिलने दो, जो मिले, इनाम हो या इल्ज़ाम।

बस्ती-ए-आदम में दम तोड़ रही है आदमीयत 
लगानी ही होगी हमें फ़िरक़ापरस्ती पर लगाम।

ख़ुदा तक पहुँच नहीं और आदमी से नफ़रत है 
बता ऐसे सरफिरों को मिलेगा कौन-सा मुक़ाम।

लुभाती तो हैं रंगीनियाँ मगर सकूं नहीं देती 
बसेरों को लौट आएँ परिंदे, जब ढले शाम।

आदमी की आदतों ने सबमें ज़हर घोला है 
सियासत ही नहीं, अब मुहब्बत भी है बदनाम।

शायद इसका नशा कुछ देर बाद रंग लाएगा 
बस पीते-पिलाते रहना ‘विर्क’ वफ़ा के जाम।

दिलबागसिंह विर्क 

4 टिप्‍पणियां:

sunilchhabra ने कहा…

बहुत सुंदर रचना

प्रभात ने कहा…

badhiya!!

Neelima Sharma ने कहा…

सुंदर

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

खूबसूरज ग़ज़ल

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