बुधवार, नवंबर 08, 2017

धड़कनों को धड़कने का ये बहाना हो गया

तेरी चाहत में ख़ुद से बेगाना हो गया 
न जाने क्यों मैं इस क़द्र दीवाना हो गया।

सब कोशिशें नाकाफ़ी रही इसे रोकने की 
शमा जो जलती देखी, दिल परवाना हो गया।

तुझे याद न किया तो इल्ज़ाम आएगा वफ़ा पर 
धड़कनों को धड़कने का ये बहाना हो गया।

मुहब्बत कब रास आई है नफ़रतपसंदों को 
फिर क्या हुआ गर दुश्मन ये ज़माना हो गया।

राहे-इश्क़ में ख़ुशियाँ नहीं मिली तो न सही 
अपना तो ‘विर्क’ ग़म से याराना हो गया। 

दिलबागसिंह विर्क
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1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (10-11-2017) को
"धड़कनों को धड़कने का ये बहाना हो गया" (चर्चा अंक 2784)
पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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