मंगलवार, नवंबर 14, 2017

कब तक डराएगा, तेरे बिना जीने का डर

मुझे ख़ुदा न समझना, कहा था मैंने मगर 
तूने पागल समझा मुझे, किसके कहने पर।

मुझ पर अब ज़रा-सा यक़ीं नहीं रहा तुझको
क्या इससे बढ़कर होगा क़ियामत का क़हर।

बस ये ही बेताब हैं गले मिलने को वरना 
नदियों का इंतज़ार कब करता है सागर।

बेवफ़ाई आबे-हयात है तो, हो मुबारक तुझे 
मुझे तो मंज़ूर है, पीना वफ़ा का ज़हर।

इसका इलाज तो ढूँढना ही होगा, आख़िर
कब तक डराएगा, तेरे बिना जीने का डर।

तेरी असलियत को जानती है सारी दुनिया 
विर्क’ यूँ ही अच्छा बनने की कोशिश न कर।

दिलबागसिंह विर्क 
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1 टिप्पणी:

sweta sinha ने कहा…

बहुत शानदार अश'आर...वाह्ह्ह👌

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