मंगलवार, मई 29, 2018

ये दिल नादां क्या-क्या करे


कभी उम्मीद बँधाए और कभी आह भरे
न पूछ मुझसे, ये दिल नादां क्या-क्या करे।

कभी सोचे तदबीर से पलट दूँगा ज़माना
कभी ये दिल अपनी ही तक़दीर से डरे।

कब नसीब होती है हमें बिस्तर पर नींद
कभी मैख़ाने में कटी रात, कभी राह में गिरे।

इन आँखों को भूलता ही नहीं वो मंज़र
चाँद-से चेहरे पर घटा से गेसू बिखरे।

कभी-कभार तो गुज़रती होगी तुम पर भी
जो हर दिन, हर रात हम दीवानों पर गुज़रे।

ये तो विर्कइस दिल की ख़ता है वरना
सारी दुनिया गवाह है, कब थे हम बुरे।

दिलबागसिंह विर्क
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1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-06-2018) को "साला-साली शब्द" (चर्चा अंक-2988) (चर्चा अंक 2731) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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