बुधवार, मार्च 20, 2019

आँखों की आदत है, हुस्न को निहारना

यूँ तो हर पल चाहा है ख़ुद को सुधारना 
मगर ख़ुदा के हाथ है तक़दीर निखारना। 

हर शख़्स से इश्क़ तो नहीं होता, ये तो बस 
आँखों की आदत है, हुस्न को निहारना। 

आसार हैं क़यामत बरपने के, देखो
क्या रंग लाएगा, उनका ज़ुल्फ़ संवारना। 

चेहरे के हाव-भाव देख चुप रह गया मैं 
चाहा था दिलो-जां से तुझको पुकारना। 

कभी आसां तो कभी बड़ा मुश्किल लगे 
किसी को आँखों से दिल में उतारना। 

मैं सफल हुआ या नहीं, मुझे मालूम नहीं 
चाहा तो था ‘विर्क’ महबूब के हाथों हारना। 

दिलबागसिंह विर्क 
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8 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (22-03-2019) को "होली तो होली हुई" (चर्चा अंक-3282) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाऔं के साथ-
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २२ मार्च २०१९ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

मन की वीणा ने कहा…

वाह उम्दा ।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह सुन्दर। होली की शुभकामनाएं।

shashi purwar ने कहा…

बहुत सुन्दर आपको और आपके पूरे परिवार होली के पावन पर्व व रंगो उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ 💐💐🌹🙏

sudha devrani ने कहा…

वाह!!!
बहुत लाजवाब...

रवीन्द्र भारद्वाज ने कहा…

बहुत खूब आदरणीय
शानदार रचना

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा ने कहा…

कभी आसां तो कभी बड़ा मुश्किल लगे
किसी को आँखों से दिल में उतारना।
बेहतरीन ..

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