बुधवार, दिसंबर 22, 2010

अग़ज़ल - 3

          
सुलगती राख को कभी छुआ नहीं करते              
आग के शरारे किसी के हुआ नहीं करते |

मुहब्बत में मैंने तो एक सबक पाया है 
वक़्त और आदमी कभी वफ़ा नहीं करते |

ये बात और है कि खुदा को कबूल नहीं हैं
         वरना कौन कहता है कि हम दुआ नहीं करते |

ज़ालिम किस्मत काट लेती है पंख जिनके  
वो परिंदे परवाज़ के लिए उड़ा नहीं करते |

दिल के साथ दिमाग की भी सुन लिया करो 
जज्बातों  की  रौ  में  यूँ  बहा  नहीं  करते |

तुम दर्द छुपाने की भले करो लाख कोशिश
मगर ये आंसू आँखों में छुपा नहीं करते |

काट रहे हैं हम ' विर्क ' वक्त जैसे-तैसे 
ये मत पूछो , क्या करते हैं , क्या नहीं करते |

दिलबाग विर्क 
          *******                

2 टिप्‍पणियां:

krishan kayat ने कहा…

gamon ka saya, tuzh pe rahe chhaya, aisa to tu gamgin nahi. husan ka mara , mohabbat me hara, gar hai bhi to hamen yakin nahi.aaj ke dour me wafa ki ummid rakhna, kya ye is dour ki touhin nahi.wafa ke liye tadapne ka kissa tera, anand to deta hai, par ye kissa taza-tarin nahi.aaj ki hakikat ke haalat dekh, dil tera bhi pasijta hoga, insan hai aakhir tu mashin nahi. awaj buland kar , unke liye bhi , jinhe khane ko roti , rahne ko jameen nahi.kis-kis ko rah dikhaye "kayat",rou me bahne ka tera jurm bhi kam sangeen nahi.

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut khoobsurat laajabaab ghazal...daad kabool kijiye.

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