रविवार, जून 05, 2011

कविता - 9

                      आतंक                                  
                   दोपहर की 
                   चिलचिलाती धूप में 
                   चारों तरफ 
                   पसरा हुआ है 
                   सन्नाटा .

                   आतंक 
                   प्रकृति का हो 
                   या मानव का 
                   देखो ,
                   किस प्रकार 
                   प्राणहीन कर देता है 
                   जन-जीवन को 

                        * * * * *

17 टिप्‍पणियां:

आशा ने कहा…

बहुत सही विचार है |बधाई
कभी मेरे ब्लॉग पर भी आएं
आशा

veerubhai ने कहा…

नंब नेस पैदा करदेता है आतंक ,प्रकृति का हो या आदमी का .सुन्दर प्रस्तुति .

veerubhai ने कहा…

बाबा को पहना दी ,कल जिसने सलवार
अब तो बनने से रही ,फिर उसकी सरकार ।
रोज़ रोज़ पिटें लगे बच्चे और लाचार ,
है कैसा यह लोक मत ,कैसी है सरकार ।
आंधी में उड़ने लगे नोटों के अम्बार ,
संसद में होने लगा ये कैसा व्यवहार ।
और जोर से बोल लो उनकी जय जैकार ,
सरे आम पीटने लगे मोची और लुहार .
संसद में होने लगा यह कैसा व्यवहार ,
सरे आम होने लगा नोटों का व्यापार ।
संसद बने रह गई कुर्सी का त्यौहार ,
कुर्सी के पाए बने गणतंत्री गैंडे चार .
भाई विर्क साहब गम नहीं पाप का घड़ा फूटने ही वाला है .कांग्रेस के मुंह में आखिरी निवाला है .बाबा गले की हड्डी बनने वालें हैं .

anu ने कहा…

आतंक नाम ही ...डर और भय का है ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 07- 06 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

वाणी गीत ने कहा…

आतंक जनहीन प्राणहीन कर देता है ...
ग्रीष्म का आतंक भी ऐसा ही है ...
बहुत खूब !

udaya veer singh ने कहा…

thode shabdon se brihad abhivyakti prakharit ho rahi hai . prabhavshali srijan .

Udan Tashtari ने कहा…

हम्म!! रचना पनी बात कह पाई.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच कहा ... पर प्राकृति के आतंक के लिए कुछ हद तक मानव ही ज़िम्मेवार है ....

ZEAL ने कहा…

Wonderful creation Sir .

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

आतंक प्रकृति का हो

या मानव का

.................

प्राणहीन कर देता है

जन जीवन को

........................सार्थक भावपूर्ण रचना

Kailash C Sharma ने कहा…

कुछ शब्दों में बहुत कुछ कह दिया...बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति..

रंजना ने कहा…

सत्य कहा...

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

आपने बहुत ही खूबसूरती से अपनी बात कह दी .

Vivek Jain ने कहा…

सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति
बधाई हो आपको - विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बहुत सही...वाकई गरमी ने आतंकित कर रखा है.

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

bahut sundar... vakai prakriti ho yaa maanv atank... janjiwan ko bejaan kar deti hai...bahut samyik rachna....
charchamanch me aane ke liye aapko badhai...
mere blog me aapka Amritras swaagat hai.

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