शुक्रवार, जुलाई 22, 2011

अगज़ल - 22

नामुराद इश्क में जब से चोट खाई है मैंने 
अपनी हस्ती रोज़ आग में जलाई है मैंने |

लगती तो है वफा करेगी, मगर करती नहीं 
अपनी किस्मत कई दफा आजमाई है मैंने |

दुनिया के बाज़ार में बिका नही बस इतना किया 
मैं नहीं कहता , वफा की रस्म निभाई है मैंने |
मरहम नहीं दे सकते तो न सही , दाद तो दो 
अपने  जख्मों  की  नुमाइश  लगाई  है  मैंने |

ये बात और है तश्नगी बुझ न पाई इसकी 
प्यासे दिल को अश्कों की मै पिलाई है मैंने |

वही दिलो-दिमाग पर हावी हुई वक्त-बेवक्त 
सोचा था ' विर्क ' जो सूरत भुलाई है मैंने |

दिलबाग विर्क 
* * * * *

20 टिप्‍पणियां:

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' ने कहा…

best

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

बेहतरीन गज़ल,हर शेर उम्दा है.

anu ने कहा…

हर शेर बहुत उम्दा....बहुत खूब

खास कर ये वाला


मरहम नहीं दे सकते तो न सही , दाद तो दो
अपने जख्मों की नुमाइश लगाई है मैंने .

ज्योति सिंह ने कहा…

वही दिलो-दिमाग पर हावी हुई वक्त-बेवक्त
सोचा था ' विर्क ' जो सूरत भुलाई है मैंने .
rachna bahut achchhi hai .

Dorothy ने कहा…

मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद.
बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग इस ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो हमारा भी प्रयास सफल होगा!

ana ने कहा…

wah.......khubsurat rachana

Vivek Jain ने कहा…

बेहतरीन,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

रविकर ने कहा…

बेहतरीन ||

ZEAL ने कहा…

very nice ghazal

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' ने कहा…

आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 26-07-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर मंगलवारीय चर्चा में भी होगी। सूचनार्थ

vidhya ने कहा…

बेहतरीन गज़ल,हर शेर उम्दा है.
आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

udaya veer singh ने कहा…

वीर ! क्या बात है चोट ऐसी भी जो नुमयास के बाद भी न दिखे , बुरा न मानो, ...
मरहम नहीं दे सकते तो न सही , दाद तो दो
अपने जख्मों की नुमाइश लगाई है मैंने .
कहाँ से लाये इतने जज्बात सारे, कुछ उधार तो दे दो
अतिशय प्रशंसनीय सृजन , बहुत शुभ कामनाएं /

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बेहतरीन .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ये बात और है तश्नगी बुझ न पाई इसकी
प्यासे दिल को अश्कों की मै पिलाई है मैंने .


बहुत खूबसूरत गज़ल

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

दुनिया के बाज़ार में बिका नही बस इतना किया
मैं नहीं कहता , वफा की रस्म निभाई है मैंने .

खूबसारत ग़ज़ल....

S.M.HABIB ने कहा…

बहुत सुन्दर...
सादर...

रेखा ने कहा…

बेहतरीन और उम्दा गजल

डॉ0 विजय कुमार शुक्ल ‘विजय’ ने कहा…

achchi ghazal.

smshindi By Sonu ने कहा…

बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.

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