बुधवार, मई 18, 2016

वादा

क़समें खाकर 
खून के ख़त लिखकर 
किए गए हों जो वादे 
सिर्फ़ वही वादे नहीं होते 

ख़ामोशी के साथ 
आँखों ही आँखों में 
होते हैं बहुत से वादे 

निभाने वाले 
निभाते हैं अक्सर 
आँखों से किए वायदे 
मुकरने वाले मुकर जाते हैं 
खून के ख़त लिखकर 

अहमियत नहीं रखती 
न कोई क़सम 
न खून की स्याही 
महत्त्वपूर्ण होती है 
दिल की प्रतिबद्धता |

दिलबागसिंह विर्क 
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7 टिप्‍पणियां:

रश्मि शर्मा ने कहा…

बि‍ल्‍कुल सही लि‍खा..नि‍ि‍भाने वाले आंखों से कि‍या वादाा भी नि‍भाते हैं।

Malhotra Vimmi ने कहा…

जी बिलकुल सही है।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (21-05-2016) को "अगर तू है, तो कहाँ है" (चर्चा अंक-2349) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

संजय भास्‍कर ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 2 जून 2016 को में शामिल किया गया है।
http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमत्रित है ......धन्यवाद !

मनीष प्रताप ने कहा…

कड़वी सच्चाई वयां करती वेहतरीन रचना। मुझे बहुत अच्छी लगी।

Asha Joglekar ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Asha Joglekar ने कहा…

दिल की प्रतिबध्दता पढें।

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