बुधवार, अक्तूबर 05, 2016

खुदा है तो खुदा बन

हमारी दुआओं का हो नहीं रहा कुछ असर 
खुदा है तो खुदा बन, क्यों बनता है पत्थर |

महौले-दहशत कब तक रहेगा जिंदगी में 
बड़ा बेचैन हैं दिल, बड़ी परेशान है नजर | 

देकर सब कुछ, अब छीन रही खुशियाँ 
ऐ तकदीर, तू मुझसे ऐसा मजाक न कर | 

यहाँ मैं रहूँ वो जगह सराए से कम नहीं 
कीमत वसूल रही है दौलत, छीनकर घर | 

दौरे-दहशत में अब सूझता कुछ भी नहीं 
किस राह चलूँ मैं, कौन-सा है मेरा सफर |

बेबसी का अहसास तो ' विर्क ' उनसे पूछो 
समेटते-समेटते गया जिनका सब कुछ बिखर | 

दिलबाग सिंह विर्क 
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सांझा संग्रह - 100 कदम  
प्रकाशक - हिन्द युग्म 
संपादक - अंजू चौधरी और मुकेश सिन्हा 

3 टिप्‍पणियां:

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

बहुत बढ़िया !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (07-10-2016) के चर्चा मंच "जुनून के पीछे भी झांकें" (चर्चा अंक-2488) पर भी होगी!
शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बढ़िया

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