बुधवार, अक्तूबर 26, 2016

कुछ हम बुरे, कुछ तुम बुरे

कुछ हम बुरे, कुछ तुम बुरे, कुछ यह जमाना बुरा 
शायद इसीलिए है यहाँ पर दिल लगाना बुरा | 

दुश्मनों की फेहरिस्त में लिख लिया मेरा नाम 
इसलिए अब लगे उनको मेरा मुस्कराना बुरा | 

तमाशबीन तो होते हैं लोग, गमख्वार नहीं 
हर किसी को अपना जख्मी दिल दुखाना बुरा | 

कहीं-न-कहीं उलझाए रखना है काम इसका 
न इसकी मानना, है ये दिल दीवाना बुरा | 

उम्मीदों का टूटना दिल से सहा नहीं जाता 
दोस्तों की दोस्ती को बार-बार आजमाना बुरा |

मेरे कहने से कब चीजों की अहमियत बदले 
मैं तो कहता हूँ ' विर्क ' मय बुरी, मैखाना बुरा | 

दिलबागसिंह विर्क 
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साँझा संग्रह - 100 क़दम
संपादक - अंजू चौधरी, मुकेश सिन्हा

5 टिप्‍पणियां:

Digamber Naswa ने कहा…

दुश्मन समझ लिया उन्होंने तो काहे का दिल लगाना ...
अच्छी ग़ज़ल है ...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (28-10-2016) के चर्चा मंच "ये माटी के दीप" {चर्चा अंक- 2509} पर भी होगी!
दीपावली से जुड़े पंच पर्वों की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kailash Sharma ने कहा…

कुछ हम बुरे, कुछ तुम बुरे, कुछ यह जमाना बुरा
शायद इसीलिए है यहाँ पर दिल लगाना बुरा |
...वाह...बहुत सुन्दर

Madan Mohan Saxena ने कहा…

वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति

मंगलमय हो आपको दीपों का त्यौहार
जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार

savan kumar ने कहा…

दुश्मनों की फेहरिस्त में लिख लिया मेरा नाम
इसलिए अब लगे उनको मेरा मुस्कराना बुरा |
बहुत ख़ूब
http://savanxxx.blogspot.in

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