बुधवार, मार्च 21, 2018

दिल की बस्ती में चुपके से आना

बेमुरव्वत, बेवफ़ा लोगों से क्या दिल लगाना 
मगर क्या करें, बेमुरव्वत है सारा ज़माना ।

उसूलों, रिवाजों के यहाँ पर बड़े सख़्त पहरे 
दिल की बस्ती में आना हो तो चुपके से आना। 

बस ये दो ही काम हैं मक़सद ज़िंदगी जीने के 
तुम्हें हर पल याद करना और ख़ुद को भुलाना। 

समझ लो आ गया है हुनर उसे ख़ुश होने का 
सीखा जिसने ग़म को रेत की मानिंद उड़ाना ।

मुहब्बत गुनाह नहीं गर मंज़ूर हो ये शर्त 
चाहत की आग में हर वक़्त दिल को जलाना। 

बस दीवानगी ही ले आई मुझे इश्क़ की राहों पर 
कभी सोचा नहीं ‘विर्क’ इस सफ़र में क्या है पाना। 

दिलबागसिंह विर्क 
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7 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (23-03-2017) को "तने को विस्तार दो" (चर्चा अंक-2918) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anita ने कहा…

वाह ! बेहतरीन गजल

sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २३ मार्च २०१८ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

shashi purwar ने कहा…

sundar gajal badhai

Sudha Devrani ने कहा…

समझ लो आ गया है हुनर उसे ख़ुश होने का
सीखा जिसने ग़म को रेत की मानिंद उड़ाना ।
वाह!!!
लाजवाब गजल....

लोकेश नदीश ने कहा…

वाह्ह्ह्ह्
बहुत उम्दा अशआर

शुभा ने कहा…

वाह!खूबसूरत ग़ज़ल।

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