बुधवार, मार्च 28, 2018

वो बेक़सूर हो गया

दिल की कली मुरझा गई, चेहरा बेनूर हो गया 
मेरे ख़्वाबों का शीशमहल जब चकनाचूर हो गया।

ख़ुद को भूलने वाला दुनिया को क्या याद करेगा 
मगर ये लोग अब कहते हैं, मैं मग़रूर हो गया । 

बड़े रंग बदले हैं हमारी क़िस्मतों के खेल ने 
ख़ताबार मैं निकला और वो बेक़सूर हो गया ।

सुकूं से हूँ मैं, ऐसी तो कोई बात नहीं मगर 
ये तो है, मैं हादसों का आदी ज़रूर हो गया ।

जिसकी दवा हो वो दर्द भी क्या कोई दर्द है 
वही जानते हैं दर्द, ज़ख़्म जिनका नासूर हो गया। 

न हँसो तुम, इस ज़ालिम ने तुम्हारा भी नहीं होना 
वक़्त के हाथों ‘विर्क’ मैं अगर मजबूर हो गया । 

दिलबागसिंह विर्क 
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1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (30-03-2017) को "सन्नाटा पसरा गुलशन में" (चर्चा अंक-2925) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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