बुधवार, जून 27, 2018

मुहब्बत तो बस मेरा मज़हब है

तेरे आने का इंतज़ार कब है 
मुहब्बत तो बस मेरा मज़हब है। 

बहते अश्कों को छुपाना कैसा 
छलकता है वही, जो लबालब है। 

कुछ तो मुझे बेवफ़ा न होना था 
कुछ याद का पहरा रोज़ो-शब है। 

कुछ-न-कुछ चलता ही रहे ज़ेहन में 
सोच का सफ़र कितना बेमतलब है ।

वस्लो-हिज्र ज़िंदगी के पहलू दो
ग़म में डूबे रहना बेसबब है ।

मंज़िल का ‘विर्क’ नामो-निशां नहीं 
ये मुहब्बत का सफ़र भी ग़ज़ब है। 

दिलबागसिंह विर्क 
*****

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (29-06-2018) को "हम लेखनी से अपनी मशहूर हो रहे हैं" (चर्चा अंक-3016) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रोहित शर्मा ने कहा…

वाह वाह क्या कहने।

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