बुधवार, जुलाई 04, 2018

मेरी आदतों में शुमार हो गया है, ये आँसू पीना

अब मुश्किल नहीं लगता मुझको घुट-घुटकर जीना 
मेरी आदतों में शुमार हो गया है, ये आँसू पीना ।

एक कसक और चंद हसीं यादें मेरे पास छोड़कर 
देखते-देखते हाथों से निकल गया वक़्त ज़रीना।

बुलंद हौसले कुछ नहीं करते गर कोई अपना न हो 
मौजों से दोस्ती क्या करेगी, जब दुश्मन हो सफ़ीना।

शायद इसीलिए लोग ज़माने के हैं नफ़रतपसंद 
नफ़रत तो है फ़िज़ा में और मुहब्बत है दफ़ीना ।

दौलतमंद होने के लिए तैयार हैं लहू बहाने को 
मगर कोई भी शख़्स नहीं चाहता बहाना पसीना। 

फ़र्क़ इसमें कुछ भी नहीं और बहुत ज्यादा भी है 
कोई कहे दिल पत्थर ‘विर्क’, कोई कहे दिल नगीना।

दिलबागसिंह विर्क
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2 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, स्वामी विवेकानंद जी की ११६ वीं पुण्यतिथि “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (06-07-2018) को "सोशल मीडिया में हमारी भूमिका" (चर्चा अंक-3023) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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