बुधवार, जुलाई 25, 2018

उनकी मर्ज़ी फ़ैसला-ए-अदालत हो गई

बिना कोई दलील सुने मेरी वफ़ा जहालत हो गई 
क़ाज़ी थे ख़ुद, उनकी मर्ज़ी फ़ैसला-ए-अदालत हो गई। 

मेरे हाथ की लकीरों में क्या लिख दिया ख़ुदा तूने 
यूँ बेसबब परेशान रहना मेरी आदत हो गई।

मुहब्बत के साए सिरों पर नहीं रहे अब किसी के 
अपनों के पहलू में भी नफ़रतों की तमाज़त हो गई। 

वहशियत की तरफ़दारी न करें लोग तो क्या करें 
शरीफ़ों के शहर में ही जब रुसवा शराफ़त हो गई। 

ये आदमी की इबादत करे, वो आदमी से सियासत 
हार जाएगा दिल, गर इसकी दिमाग़ से बग़ावत हो गई। 

यह सारा ज़माना ही ‘विर्क’ बेवफ़ाओं का है 
वो भी बेवफ़ा हुए तो कौन-सी क़ियामत हो गई। 

दिलबागसिंह विर्क 
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3 टिप्‍पणियां:

NITU THAKUR ने कहा…

बहुत सुन्दर 👌👌👌

anuradha chauhan ने कहा…

बहुत खूब 👌

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-07-2018) को "कौन सुखी परिवार" (चर्चा अंक-3045) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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