मंगलवार, जनवरी 10, 2012

अग़ज़ल - 32

खुशकिस्मत लोगों की हसीं मजलिस में शामिल नहीं हैं हम ।
न बढ़ाओ इस ओर अपनी कश्तियाँ साहिल नहीं हैं हम ।
मालूम है हमें सूखे दरख्तों पर फिर बहार आती नहीं 
उम्मीदों के सहारे जिएँ , इतने जाहिल नहीं हैं हम ।


कौन छुपाएगा हाल मेरा इस जमाने की निगाहों से 
कोई वकील नहीं हमारा, किसी के मुवक्किल नहीं हैं हम ।


अक्सर सोचा तो करते  हैं , उठें कोई तूफां बनके  
मगर सब लोग कहते हैं, इरादों में मुस्तकिल नहीं हैं हम ।


ये लम्बी तन्हाइयां मेरी , बन चुकी हैं मेरा मुकद्दर 
कोई काबिल नहीं हमारे , किसी के काबिल नहीं हैं हम ।


हालत थे ऐसे '' विर्क '' हम इंसां होकर भी इंसां न बने 
औरों की बात क्या करनी, अब खुद के मुकाबिल नहीं हैं हम 

* * * * *

9 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

औरों की बात क्या करनी, अब खुद के मुकाबिल नहीं हैं हम

गज़ल खूबसूरत है ..पर खुद के हौसले पस्त नहीं होने चाहिए ..

Voice of youths ने कहा…

ये लम्बी तन्हाइयां मेरी , बन चुकी हैं मेरा मुकद्दर
कोई काबिल नहीं हमारे , किसी के काबिल नहीं हैं हम ।

दिल को छू गई पंक्ति..बहुत बहुत धन्यवाद

chankya ने कहा…

"मालूम है हमें सूखे दरख्तों पर फिर बहार आती नहीं
उम्मीदों के सहारे जिएँ , इतने जाहिल नहीं हैं हम ।"
__________________________________

सुनो साथियों समय एक दिन एसी करवट बदलेगा !

तुच्छ नीव का पत्थर उठकर शिखरों को पलटेगा !!

आज अगर यह अन्धकार है फिर से रह ना सकेगा !

खून हमारा पीने वाला फिर से जी ना सकेगा !!

गूजेंगे फिर से घर घर में ..जीवन के वे मधुमय गान ..!

आज ना जाने कहाँ खो गए , जीवन के वे मधुमय गान !!

--Mahesh Sharma (Chankya S)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह बहुत बढ़िया!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

vandana ने कहा…

मालूम है हमें सूखे दरख्तों पर फिर बहार आती नहीं
उम्मीदों के सहारे जिएँ , इतने जाहिल नहीं हैं हम

behtareen

ईं.प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

बहुत उम्दा प्रस्तुति विर्क जी ।
मेरी नई कविता देखें । और ब्लॉग अच्छा लगे तो जरुर फोलो करें ।
मेरी कविता:मुस्कुराहट तेरी

veerubhai ने कहा…

हालत थे ऐसे '' विर्क '' हम इंसां होकर भी इंसां न बने
औरों की बात क्या करनी, अब खुद के मुकाबिल नहीं हैं हम
शानदार पोस्ट .

कुमार राधारमण ने कहा…

अत्यन्त निराशावादी और खेदजनक प्रस्तुति। ऐसी मानसिकता अनुकूल नहीं है-न अपने लिए न औरों के।

vidya ने कहा…

अक्सर सोचा तो करते हैं , उठें कोई तूफां बनके
मगर सब लोग कहते हैं, इरादों में मुस्तकिल नहीं हैं हम ।

बहुत खूब!!!!!!

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