शनिवार, जनवरी 21, 2012

अग़ज़ल - 33

         रोना आया , कभी अपने हाल पर हंसी आई 
         बुरा न था मगर, मुझ पर हावी होती गई बुराई ।

         मैंने तो सोचा था, ढल जाएगा गम का यह मौसम 
         लेकिन लम्बी होती चली गई खुशियों से जुदाई ।

         क्यों कोई मसीहा उतरे ही नहीं इस जमीन पर 
         क्यों इन्सां और इन्सां के बीच बढती जाए खाई ?

         समझ नहीं आया मुझे क्यों दुश्मन हुआ जमाना 
         क्या गुनाह किया था मैंने , थी अगर वफा निभाई ।

         क्यों चहकते हैं नफरतों के फूल ऐ दुनियावालो 
         क्यों हैं मुहब्बत की कलियाँ मुरझाई - मुरझाई ?

         बहुत कुछ पाया है मगर कुछ खाली-खाली सा है 
         हैरान हूँ मैं , हमने है ये कैसी तकदीर पाई ।

         भीड़ में विर्क याद नहीं रहती अपनी औकात 
         गर सोचना चाहो खुद को तो मांगना तन्हाई ।

* * * * *

5 टिप्‍पणियां:

anju(anu) choudhary ने कहा…

बहुत कुछ पाया है मगर कुछ खाली-खाली सा है
हैरान हूँ मैं , हमने है ये कैसी तकदीर पाई ।


वाह बहुत खूब .......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत शानदार रही यह अगजल!

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

waah............virk ji bahut hi sanvedanshil rachna aapki........

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

क्यों चहकते हैं नफरतों के फूल ऐ दुनियावालो
क्यों हैं मुहब्बत की कलियाँ मुरझाई - मुरझाई ?

बहुत खूब .......

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत गजल ....

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