रविवार, जून 03, 2012

अगज़ल - 41

               इतना बेगानापन दिखाओगे, सोचा न था 
           मेरी हार का जश्न मनाओगे, सोचा न था ।
           तड़पने, आहें भरने का माद्दा तो था मगर 
           तुम खून के आंसू रुलाओगे, सोचा न था 

           ऐतबार के बिना कब कटे जिन्दगी का सफर 
           हर मोड़ पर हमें आजमाओगे, सोचा न था ।

           सोचा था, वा'दे वफा के हैं पत्थर पर लकीर 
           इन्हें रेत की मानिंद उड़ाओगे, सोचा न था ।

           दुश्मन न थे, हम तो आपकी ख़ुशी से खुश थे 
           राजे-दिल हमसे छुपाओगे , सोचा न था ।

           बीता हुआ हर लम्हा निकाल दिया जिन्दगी से
           हमें विर्क इस कद्र भुलाओगे , सोचा न था । 

                          *************** 

10 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

expression ने कहा…

वाह ......

बेहतरीन अगज़ल....

सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

भावपूर्ण गज़ल

Rajesh Kumari ने कहा…

शब्द छोटे पड़ रहे हैं तारीफ़ के लिए दिली दाद कबूल करें इतनी लाजबाब ग़ज़ल के लिए

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

ऐतबार के बिना कब कटे जिन्दगी का सफर
हर मोड़ पर हमें आजमाओगे, सोचा न था ।

बेहतरीन गज़ल,वाह!!!!!!!!!

udaya veer singh ने कहा…

बेहतरीन गज़ल......

ऋता शेखर मधु ने कहा…

वाह !!!
लाजवाब ग़ज़ल...
सभी शेर बेहतरीन...

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

कहा मैंने इस दिल से ,इसे याद रख
उन्हें तुमसे नफ़रत हैं ,उल्फत नहीं |

babanpandey ने कहा…

लाज़वाब है भाई

Dr.Sushila Gupta ने कहा…

ऐतबार के बिना कब कटे जिन्दगी का सफर
हर मोड़ पर हमें आजमाओगे, सोचा न था ।


wahhhh.....bhavnatmak prastuti ke lie aapko hardik dhanyavad.

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