मंगलवार, नवंबर 19, 2013

आँख को अश्क मंजूर है

पा रहा दिल यहाँ साथ भरपूर है
प्यार में आँख को अश्क मंजूर है ।

दूरियाँ और नजदीकियाँ झूठ सब
पास पाऊँ तुझे, तू भले दूर है ।

इश्क़ में डूबकर जान पाया यही
हर तरफ छा रहा एक ही नूर है ।

सीरतें सूरतों से सदा बेहतर
हुस्न यूँ ही नशे में हुआ चूर है ।

रात-दिन काम के फिक्र में घूमता
आदमी तो महज एक मजदूर है ।

थूकता था जमाना जिसे देखकर
देख लो शख्स वो आज मशहूर है ।

हाथ से हाथ पर्दा रखे है यहाँ
ये नए दौर का ' विर्क ' दस्तूर है ।

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1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

नये दौर में हो गये, नये-नये दस्तूर।
चमक-दमक के साथ में, कृत्रिमता भरपूर।।

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