बुधवार, नवंबर 13, 2013

तुझे सोचता है जहन रात - दिन

परिन्दे उजाड़ें चमन रात-दिन
सुलगता रहे दिल, जलन रात-दिन ।

मिरे देश की है सियासत बुरी
यहाँ बिक रहे हैं कफन रात-दिन ।

पुरानी हुई बात तहजीब की
बदलने लगा है चलन रात-दिन ।

रहा रोग अब सिर्फ दिल तक नहीं
तुझे सोचता है जहन रात - दिन ।

बँधा था सदा फर्ज की डोर से
किया ख्वाहिशों का दमन रात-दिन ।

निराशा मिली ' विर्क ' औलाद से
परेशान रहता वतन रात-दिन ।
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2 टिप्‍पणियां:

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

रोज़मर्रा के रोज़नामचे से दो चार होने की तहरीर है ये गज़ल। खूब सूरत नसीहत आशीष है ये गज़ल।

व्यक्ति और समष्टि एक राष्ट्र एक पूरी शती की पीर समेटे है यह गज़ल। हर अशआर पीर का सांझा अनुभूति तदानुभूति कराता है -

मिरे देश की है सियासत बुरी
यहाँ बिक रहे हैं कफन रात-दिन ।

पुरानी हुई बात तहजीब की
बदलने लगा है चलन रात-दिन ।

कालीपद प्रसाद ने कहा…

हर अशआर में एक अलग अनुभूति का एहसास है!
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