रविवार, मार्च 27, 2011

अगज़ल - 14

चमकते हैं जो सितारे आसमां पर 
जमीं पर आकर हो जाते हैं पत्थर ।

हक मांगने की आदत छोडनी होगी 
अगर चाहते हो तुम ,बने प्यारा-सा घर ।

बहुत  गहरे  हैं  गमों  के  ये  अँधेरे
छोटी-सी जिन्दगी और लम्बा सफर ।

चिरागे-उम्मीद को तुम जलाए रखना 
ये  बुरा  वक्त  भी  कभी  जाएगा  गुजर ।

मुसाफिर हैं हम , चलना हमारा काम
मालूम  नहीं  हमें , है  मंजिल  किधर ।

फिर गम कैसा ' विर्क , बाज़ी हारने का 
कब जीता जाता है जिन्दगी का समर ।


दिलबाग विर्क 
* * * * *
                                समर  - युद्ध 
                       * * * * *
                        
      

9 टिप्‍पणियां:

योगेन्द्र पाल ने कहा…

बहुत सुन्दर,

कविता टैग का प्रयोग किया करें

क्या आपने अपने ब्लॉग में "LinkWithin" विजेट लगाया ?

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@ भाई मेरे दिलबाग !
आपने तो कर दिया मेरा दिल बाग बाग !!

ZEAL ने कहा…

बुरा वक़्त भी गुज़र ही जाता है ...सुन्दर पंक्तियाँ ।

Patali-The-Village ने कहा…

चिरागे-उम्मीद को तुम जलाए रखना
ये बुरा वक्त भी कभी जाएगा गुजर|
बहुत खूबसूरत रचना| धन्यवाद्|

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

'चिरागे उम्मीद को तुम जलाए रखना
ये बुरा वक्त भी कभी जायेगा गुज़र '

उम्दा शेर .....सभी शेर बेहतरीन

Kunwar Kusumesh ने कहा…

मुसाफिर हैं हम , चलना हमारा काम
मालूम नहीं हमें , है मंजिल किधर .

वाह , इस सोच के साथ तो मंजिल का मिलना तय है.

सारा सच ने कहा…

nice

सारा सच ने कहा…

nice

Amrita Tanmay ने कहा…

Behtareen...vaah! vaah! yu hi likhate rahiye..shubhkamna..

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