मंगलवार, मई 10, 2011

चीरहरण

  कुछ - न - कुछ तर्क तो 
  रहते ही हैं 
  सबके पास 
  अपनी बात को 
  सत्य ठहराने के लिए .

  ये तर्क 
  अवश्य रहे होंगे 
  सिंहासन के प्रति निष्ठावान 
  भीष्म पितामह के पास .
  ये तर्क 
  अवश्य रहे होंगे
  कुल गुरु कृपाचार्य के पास . 
  ये तर्क 
  अवश्य रहे होंगे 
  कौरवों-पांडवों के गुरु 
  और माननीय सभासद 
  द्रोणाचार्य के पास .
  ये तर्क 
  अवश्य रहे होंगे 
  महान नीति विद 
  विदुर के पास .
  तभी तो 
  वे सभी 
  न सिर्फ खामोश रहे 
  द्रोपदी चीरहरण के समय 
  अपितु 
  इसके बाद भी 
  चिपके रहे 
  अपने-अपने पदों से . 

  इन तर्कों के कवच 
  मौजूद हैं आज भी 
  हम सबके पास 
  तभी तो 
  मुट्ठी भर दुशासन 
  चंद दुर्योधनों के कहने पर 
  आज भी सफल हो रहे हैं 
  द्रोपदी चीरहरण करने में  
  बहुत सारे
  भीष्म पितामहों 
  कृपाचार्यों
  द्रोणाचार्यों  
  और 
  विदुरों के रहते हुए .

      * * * * * 

10 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत उम्दा!

: केवल राम : ने कहा…

तभी तो
मुट्ठी भर दुशासन
चंद दुर्योधनों के कहने पर
आज भी सफल हो रहे हैं

वर्तमान हालत पर गहरा व्यंग्य किया है आपने और सच्ची को सामने लाने का प्रयास किया है ...आपका आभार

kkk ने कहा…

बहुत ही सुंदर एवं समसामयिक रचना . वफ़ा मोहब्बत के किस्सों से निकल कर समाज को परखने व समालोचना के लिए आप बधाई के पात्र हैं , साहित्य समाज का दर्पण व मार्गदर्शक होता है . इसे जारी रखें...............

ZEAL ने कहा…

एक अति खूबसूरत कविता दिलबाग जी ,
बधाई।

कुश्वंश ने कहा…

सुन्दर शब्दों में ... भावमयी रचना

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा....

बेनामी ने कहा…

"कुछ-न-कुछ तर्क तो
रहते ही हैं
सबके पास
अपनी बात को
सत्य ठहराने के लिए .

सही कहा आपने ...."
कुछ ऐसे ही तर्क देते हैं तभी तो हम उसके परिणामों से खुद को
मुक्त कर पाते हैं !
बेहतर हुआ तो सेहरा अपने सर और ख़राब हुआ तो दूसरे पर,
जिसमें भाग्य,इंसान,परिस्थिति नहीं तो भगवान तो है ही,
उसी पर डाल कर मुक्त हो जाते हैं !
दुर्योधन,दुश्शासन,भीष्म,ध्रितराष्ट्र और साथ में
धर्मराज युधिष्ठिर जिन्होंने अपनी
पत्नी की मर्यादा को ही दाँव पर लगा दिया,
आज भी समाज में मौजूद हैं बस स्वरुप बदल गए हैं !!
चीरहरण आज भी होता है,अपने आज भी
मूक बने देखते रहते है,आज भी धर्मराज बने पति अपनी
पत्नी की इज्ज़त दाँव पर लगते हैं......
समय बदला है परन्तु सामजिक परिवेश और 'व्यक्ति विशेष'
(मैं सब की बात नहीं कर रही हूँ ) की सोच आज भी नहीं बदली है,
उतनी ही संकुचित है और कहीं-कहीं तो उससे भी ज्यादा.....

***punam***
"bas yun...hi.."

Richa P Madhwani ने कहा…

http://shayaridays.blogspot.com

आशा ने कहा…

बहुत अच्छी रचना बधाई
आशा

प्रताप नारायण सिंह (Pratap Narayan Singh) ने कहा…

बहुत सुन्दर! एक वैचारिक कविता !

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