मंगलवार, नवंबर 22, 2011

निर्णय के क्षण ( कविता ) - अंतिम भाग


          विचारों की यह लहर 
          जितनी तेजी से उठी थी 
          समाप्त हो रही है 
          उतनी ही तेजी से ।
          लहरों का बहाव 
          अब फिर नया मोड़ ले रहा है 
          पुराने अपमान की कहानी 
          बीते दिनों की याद
          घूम जाती है 
          आँखों के सामने
          चलचित्र की तरह ।

          क्या समाज के लिए  
          उसे हीन जाति का कह-कहकर 
          उसकी हीनता का बोध करवाना 
          उचित था ?
          एक कुलीन वर्ग 
          और माननीय लोगों द्वारा 
          किया गया वह व्यवहार 
          क्या उचित था ?
          एक शूरवीर के अपमान को सहना 
          क्या एक शासक के लिए उचित था ?
          यदि वह सब कृत्य उचित थे 
          तो कैसे अनुचित है उसका अभिमान 
          क्या वह इंसान नहीं है ?
          क्या उसके जज्बात नहीं हैं ?

          जो भी हो 
          कल तो बीत गया है 
          बात तो आज की है 
          बात तो आने वाले कल की है 
          बात तो दो कर्त्तव्यों में से 
          किसी एक को चुनने की ।

          कर्ण के सम्मुख 
          एक तरफ जीवन है तो 
          दूसरी तरफ संभवत: मृत्यु है 
          जिधर जीवन है उधर जाना 
          कायरता भी है 
          और कृतघ्नता भी 
          जबकि मौत को गले लगाकर 
          कृतज्ञ बना जा सकता है ।
 
          यह सोचते ही 
          कर्ण
          धनुष धारण करके 
          इति श्री कर देता है द्वंद्व की  
          अभी कुछ देर पहले ही जन्मे 
          कुंती पुत्र कर्ण का वध कर देता है 
          अब शेष रह जाता है 
          सिर्फ वो राधेय
          जो दुर्योधन का मित्र है 
          और दुर्योधन की सेना का नेतृत्व करना ही 
          अब कर्त्तव्य है उसकी दोस्ती का
          और शायद यही है 
          उसका पश्चाताप भी 

              * * * * *

9 टिप्‍पणियां:

shikha varshney ने कहा…

बेहतरीन ...पिछले भाग भी पढकर आते हैं.

Pallavi ने कहा…

बहुत उम्दा.... पहली बार आना हुआ है आपके ब्लॉग पर पिछले भाग भी पढ़कर मिलते हैं ....इस बीच यदि समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

"निर्णय के क्षण" कविता का अंतिम भाग भी बहुत प्रभावशाली रहा!

Sunil Kumar ने कहा…

कविता का यह भाग भी बहुत प्रभावशाली ........

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बढ़िया रचना

Gyan Darpan
Matrimonial Site

ZEAL ने कहा…

अब शेष रह जाता है
सिर्फ वो राधेय
जो दुर्योधन का मित्र है
और दुर्योधन की सेना का नेतृत्व करना ही
अब कर्त्तव्य है उसकी दोस्ती का
और शायद यही है
उसका पश्चाताप भी ...

Very touching lines... It's not easy to feel Karna's pain and humiliation that he lived throughout his life.

.

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

अब शेष रह जाता है
सिर्फ वो राधेय
जो दुर्योधन का मित्र है
और दुर्योधन की सेना का नेतृत्व करना ही
अब कर्त्तव्य है उसकी दोस्ती का
और शायद यही है
उसका पश्चाताप भी .
निर्णय के क्षण को सार्थक करती बेजोड़ रचना.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कर्ण के मनोभावों को शब्द प्रदान किये हैं .. एक भाग छुट गया था वो भी अब पढ़ लिया है ... सुन्दर प्रस्तुति

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

सभी भाग में कर्ण के अंतर्द्वंद बहुत अच्छी तरह उभर कर आए थे...
निर्णय के क्षण का प्रस्तुतिकरण भी बहुत सशक्त रहा...

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