शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011
शनिवार, अप्रैल 16, 2011
अगज़ल - 16
ये लोग न जाने क्यों जहर पीने की बात करते हैं
हम तो सब गम उठाकर भी जीने की बात करते हैं ।
एक नजर काफी है दोस्त-दुश्मन पहचानने के लिए
वो तो नादां हैं, जो साल- महीने की बात करते हैं ।
जख्म देना जिनका पेशा है, महफिलों में अक्सर वो
हमदर्दी की खातिर, जख्मी सीने की बात करते हैं ।
हिन्दू-मुस्लमान हैं सब मगर इन्सां कोई नहीं
कभी काशी, कभी मक्के-मदीने की बात करते हैं ।
गर दगेबाज़ नहीं हैं तो अनजान जरूर होंगे वो
पत्थरों से भरकर दामन, जो नगीने की बात करते हैं ।
मेरी समझ से तो परे है, ये पागल दुनिया वाले
मुहब्बत को छोडकर किस दफीने की बात करते हैं ।
वो लहू और तलवार की बात ले बैठते हैं ' विर्क '
जब भी हम मेहनत और पसीने की बात करते हैं ।
दिलबाग विर्क
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जख्मी सीने --- घायल दिल
दफीने --- जमीन में गड़ा धन
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मंगलवार, अप्रैल 12, 2011
शनिवार, अप्रैल 09, 2011
लघुकथा - 3
आज का सच
अध्यापक ने बच्चों को ईमानदार लकडहारा कहानी याद करने के लिए दी थी . अगले दिन कहानी सुनी जा रही थी . सुनाते वक्त एक बच्चे की जवान लडखड़ाई ." लकडहारा ईमानदार आदमी था ", कहने की बजाए वह बोला -" ईमानदार आदमी लकडहारा था ."
अध्यापक सोच रहा है कि यही तो आज के वक्त का सच है कि ईमानदार आदमी लकडहारा ही है , अर्थात मजदूर है , गरीब है , बेबस है , मामूली आदमी है और जो भ्रष्ट है वह मालिक है , अमीर है , शहंशाह है , मजे में है .
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सोमवार, अप्रैल 04, 2011
अगज़ल - 15
करके प्यार ख़ुशी के लिए दुआ न करना
गले लगा लेना , गम को खफा न करना ।
हमदर्दी की मरहम , बन जाती है नश्तर
इश्क के जख्मों पर कभी दवा न करना ।
मुबारिक कहना हर ढलती हुई शाम को
अंधेरों के लिए किस्मत से गिला न करना ।
जुदाई में तुम चूम लेना तन्हाइयों को
प्यार भरी यादों को मगर तन्हा न करना ।
यादों की आग में मिटा देना हस्ती अपनी
जीने के लिए बेवफाई से वफा न करना ।
जिसे दिल दिया हो गर वो पत्थर भी निकले
तो ' विर्क ' उस पत्थर से भी दगा न करना ।
दिलबाग विर्क
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