बुधवार, दिसंबर 07, 2011

जिंदादिली ( कविता )


          तालियों की गड़गड़ाहट 
          और 
          पेट की भूख 
          कर देती है मजबूर 
          मौत के मुंह में उतरने को 
          यह जानते हुए कि
          यह वीरता नहीं 
          मूर्खता है ।
          
         बाजीगिरी
         कोई चुनता नहीं शौक से
         यह मुकद्दर है
         गरीब समाज का 
         और इस मुकद्दर को 
         कला बनाकर जीना 
         जिन्दादिली है 
         और यह जिन्दादिली 
         जरूरी है क्योंकि 
         जिन्दगी जीनी ही पड़ती है 
         चाहे रो के जियो
         चाहे हँस के जियो
         चाहे डर के जियो
         चाहे जिन्दादिली से जियो ।


                  * * * * *

10 टिप्‍पणियां:

Archana ने कहा…

बहुत खूब...जिंदगी जीना भी एक कला है ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर और प्रेरक रचना!

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत खूब.प्रेरक रचना!

Maheshwari kaneri ने कहा…

प्रेरक रचना!.. बहुत खूब.

सदा ने कहा…

वाह ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

sushma 'आहुति' ने कहा…

बेजोड़ भावाभियक्ति....

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ सच में शुरुआत तो ऐसे ही हो जाती है ...लेकिन निभाते हुए जीते रहना जिन्दादिली है ही
भ्रमर ५
प्रिय दिलबाग जी आप की ये रचना हमारे ब्लॉग प्रतापगढ़ साहित्य प्रेमी मंच पर भी पोस्ट की जा रही है

यह मुकद्दर है
गरीब समाज का
और इस मुकद्दर को
कला बनाकर जीना
जिन्दादिली है

रविकर ने कहा…

एक और शानदार
और
प्रभावी प्रस्तुति ||
बधाई ||

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

अपने पे हँस के जग को हँसाया
बनके तमाशा दुनियाँ में आया.

ZEAL ने कहा…

बाजीगिरी
कोई चुनता नहीं शौक से....

lovely !

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