गुरुवार, दिसंबर 01, 2011

अग़ज़ल - 29


एक जवाबहीन सवाल बनकर रह गया 
मेरा प्यार तो बस ख्याल बनकर रह गया ।
    
कुछ पलों में ही ख़ामोश होना था इसे 
जज्बों का तूफ़ान उबाल बनकर रह गया ।

काश! उधर से भी होती कोशिशे-बगावत 
पर वह रिवाजों की ढाल बनकर रह गया ।
अब नहीं रही रिश्तों की कुछ भी अहमियत 
हर हुनर शतरंजी चाल बनकर रह गया ।

न हक़ीक़त बन सका, न उतर सका ख्यालों से 
इश्क़ तो बस अब मिसाल बनकर रह गया ।

खेल की तरह होना था इसको मगर ' विर्क '
ज़िन्दगी का सफ़र जंजा़ल बनकर रह गया ।

दिलबाग विर्क    
* * * * * *

6 टिप्‍पणियां:

anju(anu) choudhary ने कहा…

isi ka nam jindagi hai

kahi kis karwat...kabhi kis karwat...koi nahi janta

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बहुत खूब.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

संजय भास्कर ने कहा…

अब नहीं रही रिश्तों की कुछ भी अहमियत
हर हुनर शतरंजी चाल बनकर रह गया ।
......क्या खूबसूरत ग़ज़ल कही है...सुभान अल्लाह...वाह

vidhya ने कहा…

वाह!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत सुन्दर... खूबसूरत ग़ज़ल ..

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