शनिवार, जनवरी 15, 2011

षटपदीय छंद - 2


        अभिशाप न बनाएँ इसे ,विज्ञान है वरदान 
        इंसान के लिए इसने , किए हैं कार्य महान .   
       किए हैं कार्य महान , दिखाई उन्नति की राह 
       चाँद  पर  पहुंचने  की , पूरी  हुई  है  चाह  .
       फल मिलता है तभी , सोच रहे जब निष्पाप 
       कहता  'विर्क ' सबसे , विज्ञान नहीं है अभिशाप .


                             * * * * *

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सॉरी!
इससे पूर्व की टिप्पणी में वर्तनी की त्रुटियाँ हो गईं थीं-
कुण्डलिया को देख कर, मन में जगी उमंग।
लिखने के अन्दाज़ ने, किया रंग में भंग।।
किया रंग में भंग, छन्द नहीं गेय बने हैं।
गति-यति और विराम, हुए निष्प्राण घने हैं।।
कह मयंक कविराय, सजाओ दोहावलिया।
खुश हो करके लोग, पढ़ेंगे तब कुण्डलिया।।

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